
सबमें स्वयं को देखना
जो मनुष्य सब प्राणियों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सब प्राणियों में देखता है, उसके मन में घृणा और भेदभाव के लिए स्थान नहीं रहता।
ऋताभा · उपनिषद् अमृत
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जो मनुष्य सब प्राणियों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सब प्राणियों में देखता है, उसके मन में घृणा और भेदभाव के लिए स्थान नहीं रहता।
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उत्तर से पहले पात्रता — तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा

मन की लगाम बुद्धि के हाथ — तो जीवन-यात्रा सफल

सबको अपने समान देखो — घृणा स्वयं मिट जाएगी

दुनिया वैसी ही दिखती है, जैसी तुम्हारी प्रज्ञा

जैसा अन्न, वैसा मन — जो भीतर लेते हो, वही बन जाते हो

जागना, सपना, गहरी नींद — और इनके पार तुरीय

तुम दुर्बल नहीं; अमृत के पुत्र हो

शिक्षा का अंतिम उपदेश — जीवन भर का संविधान

एक फल चखता है, एक केवल देखता है — तुम साक्षी बनो

सत्य ही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है

सब कुछ ईश्वर का — हम केवल ट्रस्टी हैं

दम, दान, दया — जीवन के तीन अनुशासन