उपनिषद् अमृत · मनन से आचरण तक

ज्ञान-संग्रह

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सबको अपने समान देखो
ईशोपनिषद् 6

सबमें स्वयं को देखना

जो मनुष्य सब प्राणियों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सब प्राणियों में देखता है, उसके मन में घृणा और भेदभाव के लिए स्थान नहीं रहता।
ऋताभा · उपनिषद् अमृत

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उपनिषद् अमृत संग्रह

जिज्ञासा का संस्कार

जिज्ञासा का संस्कार

उत्तर से पहले पात्रता — तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा

जीवन-रथ

जीवन-रथ

मन की लगाम बुद्धि के हाथ — तो जीवन-यात्रा सफल

सर्वात्मभाव

सर्वात्मभाव

सबको अपने समान देखो — घृणा स्वयं मिट जाएगी

प्रज्ञानं ब्रह्म

प्रज्ञानं ब्रह्म

दुनिया वैसी ही दिखती है, जैसी तुम्हारी प्रज्ञा

आहार-शुद्धि

आहार-शुद्धि

जैसा अन्न, वैसा मन — जो भीतर लेते हो, वही बन जाते हो

ॐ — चेतना की चार अवस्थाएँ

ॐ — चेतना की चार अवस्थाएँ

जागना, सपना, गहरी नींद — और इनके पार तुरीय

अमृतस्य पुत्राः

अमृतस्य पुत्राः

तुम दुर्बल नहीं; अमृत के पुत्र हो

गुरुकुल का अंतिम पाठ

गुरुकुल का अंतिम पाठ

शिक्षा का अंतिम उपदेश — जीवन भर का संविधान

दो पक्षी, एक वृक्ष

दो पक्षी, एक वृक्ष

एक फल चखता है, एक केवल देखता है — तुम साक्षी बनो

आत्मानुभूति

आत्मानुभूति

सत्य ही तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है

त्याग में भोग

त्याग में भोग

सब कुछ ईश्वर का — हम केवल ट्रस्टी हैं

मेघ-गर्जना का मंत्र

मेघ-गर्जना का मंत्र

दम, दान, दया — जीवन के तीन अनुशासन